A collection of my poems for you to read and ponder. If you don't get the message, the moral embedded in my words then either I have failed as a poet or you have failed as a human.
Wednesday, 1 April 2026
Far Away From Hell
Monday, 6 April 2020
सिर्फ दीपक नही जलवाया है.
Thursday, 2 August 2018
स्वास्थ्य विभाग
आशा ने घर घर जा कर के ओ.आर.एस थमाना है,
अगस्त 10 से बच्चो को कृमि मुक्त भी बनाना है,
और उधर देखो पोलियो की दवा भी लाई है,
13 अगस्त से याद रखना, सघन आई एम आई है,
उसके ऊपर स्कूल मदरसे की सूची भी बनानी है,
न जाने और कौन से कार्यक्रम करवाने की ठानी है,
गुड़ में गोबर, गोबर में गुड़ कही न हो जाये,
ओ.आर.एस घर घर पिला, आशा पोलियो न थमा आये,
देखो कही न एल्बेंडाजोल पानी मे घुलवा दे वो,
IMI के हेड काउंट में स्कूल के बच्चे चढ़ा दे वो,
खैर चलो हमको क्या करना, जो होना है वो होना है,
ऐसी कमरों में जब बने योजना, तो गाव में सबको रोना है।
Wednesday, 5 October 2016
मैं कलाकार हूँ
मरने दो, मरने दो,
कुछ आशियाने उजड़ने दो,
मैं खुश हूं अपने बंगले में,
सरहद पे ख्वाब बिखरने दो।
मैं कलाकार हूं, मुझको क्या,
मेरी कोई सरहद नही,
मैं खेल रहा हूँ खजानों में,
पर भूख की कोई हद नही,
भले दुश्मन घर में घुस आए,
और करे गोलियों की बौछार,
सरहद को मगर न बंद करो,
मत बन्द करो मेरा व्यापार,
मुझे इस सबसे रखो परे,
किसी उद्धघाटन में बुला लेना,
कही नाचना हो, कही गाना हो,
तो दाम सही लगा लेना।
मैं अमन दूत, मैं हूं महान,
मेरे काम के आगे क्या कुछ जान,
मत छेड़ो मेरी दुनिया को,
चाहे बन जाए मुल्क ये शमशान,
भले रोज़ सरहद से आये,
टूटी लाठी किसी माता की,
लिपटी तिरंगे में पहुचे,
मुर्दा खुशियां किसी ब्याहता की,
मुझको क्या जो कोई मर गया,
सेना में क्यों गया था वो,
मैं कलाकार मेरा काम बड़ा,
करगिल पे फिल्म बनाने दो।
Tuesday, 4 October 2016
आगाज
वो भारत अब नही रहा, जो हाथ बाँध के बैठा था,
वो भारत अब नही रहा, जो गोली खाता रहता था,
एक नया आगाज़ है ये, तुम हद में रहना शुरू करो,
घुस के मारेंगे अब तो, बहुत सहा अब तुम डरो।
तुम ने सोच लिया था कि, खून हमारा पानी है,
तुम ने ठान लिया था कि, हस्ती हमारी मिटानी है,
हम फिर भी उम्मीद में थे, थे खड़े गुलाब लिए हाथो में,
तुम खंजर भोक रहे थे पर, हम फसे हुए थे बातों में,
धीरज को हमारे समझ लिया, था तुमने हमारी कमजोरी,
देने को ज़ख्म हमे तुमने, कोई कसर थी नही छोड़ी,
पर भूल गए की दिल्ली में, एक शेर हमने भेजा है,
वो इटली का रोबोट नही, भारत माता का बेटा है,
सेना के हाथों में बंधी हुई, ज़ंजीर को उसने तोड़ दिया,
तेरे ही घर में घुस के हमने, तेरी कायर सेना को फोड़ दिया,
अब वक़्त नही बचा तेरा, बस उलटी गिनती शुरू करो,
एक नया आगाज़ है ये, बस बहुत हुआ अब तुम मरो।
Saturday, 24 September 2016
Zombiephobic
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| A "Liberal" welcome |
Let 'em burn down your culture
Don't resist the infestation
Let them pick you like a vulture
There is nothing wrong with them,
They just want all humans dead,
They are poor mental patients,
Who want to bleed you red,
It has nothing to do with a virus,
All viruses are the same,
They burned their lands to ashes,
So they come here to maim,
Please let them in your house,
They are hungry and sick,
And if you don't open the door,
You'll be branded zombiephobic.
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| The Virus spreads |
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| The Invasion |
You are expected to bend,
Compliance is expected,
Your life will start to rend,
And if you do protest,
Liberals will shout you down,
Force you into a silence,
As zombies tear your town,
The landscape will change,
To suit their bloodied needs,
Laden with liberal guilt,
You'll be forced to concede,
So let them take a bite,
As the apocalypse ticks,
You have nowhere to hide,
Die! You zombiephobic.
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| The Future |
Saturday, 20 August 2016
Enemies in my home
Why do I leave my family behind?
Who is it I am trained to fight?
Answers are all that I try to find.
I am wearing a vest, so his bullets won't hurt me,
And yet I fall down, bleeding through my back,
Disbelief in eyes, hollow in my chest,
I feel a searing pain, shooting through my soul,
You can treat my wounds, but I'll never be whole,
I gunned down a foe, just before I fell,
I watch you cry for him, Why? I cannot tell.
Tell me for whom I sacrifice?
How do I end up being ignored?
Tell me how do you infer,
As I fall bleeding down on floor.
But I don't see the reason, for your enmity,
I can fight a war, I can brave the bombs,
Sadly am not trained to face the enemy's pawns.
Tell me am I wrong, in defending you,
I read your words demonishing, all that I do,
Who do I take a bullet for, am not really sure,
There's an enemy in my home, like I've never faced before.
Sunday, 18 October 2015
साहित्य अब चिल्लाएगा
सल्तनत के पैरो में पायल बन को जो बज जाए,
कलियुग में वही कलम, साहित्य बन के बस जाये,
बदली सल्तनत जो, सर से हाथ उठ जायेगा,
साहित्य तब चिल्लाएगा-2
भाई भाई को मारता रहा, बहनो की आबरू लुटती रही,
भ्रष्टाचार के दलदल में, माँ भारती तो झुकती रही,
आज़ादी नीलाम हुयी, एक रजवाड़े की ग़ुलाम हुई,
मगर साहित्यकारों के जीवन में कभी न शाम हुयी,
जो चटकी रजवाड़े की पहली ईट, अँधेरा छाएगा,
साहित्य तब चिल्लाएगा-2
खून में डूब चौरासी, लहूलुहान हुआ भागलपुर,
साहित्य के गलियारों में, बजते रहे श्रद्धा के सुर,
चीखे उनकी चौखट पे, टकरा के दम तोड़ गयी,
सरकारी सम्मान से दब के, रूहे उम्मीदें छोड़ गयी,
जिस कलम से लार थी टपकी, वो आज लहू बहायेगा,
साहित्य अब चिल्लायेगा,
नमक का क़र्ज़ चुकाएगा।
- अर्चित लखनवी (Archwordsmith)
Saturday, 22 August 2015
उठ ! (Rise Up)
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| Image courtesy : Google images |
उठ!
उठ के क्यों तू थक गया, मंजिल तेरी है सामने,
क्यों तुझे दरकार है, आये कोई तुझे थामने ?
क्यों वनों में तू भटकता, ढूंढता बैसाखिया ?
क्यों तेरे अम्बर को धुंधला कर दिया है शाम ने ?
क्या ये काली राती है, या नैन तेरे बंद है,
क्यों तेरा ये तेज मधम, हौंसला यु मंद है,
तू बिना पंखों के भी है लांघ सकता खाईया,
जीतना स्वयं से है, स्वयं से ही ये द्वन्द है,
पथ पे तेरी आएँगी दुश्वारिया हर कदम,
रक्त-रंजित होगा तू और ठोकरे न होंगी कम,
जो रुका तू आंस बांधे, फिर नहीं बढेगा तू,
एकला चला तू चल, किसी के भी लिए न थम.
उठ!
उठ के तूने सीखा है, नही कभी भी हारना,
तुझे डिगा सकेगी न, कभी कोई प्रताड़ना,
खड़ा हिमालय ताकता, है फेकता चुनौतिया,
है लक्ष्य तेरा हर शिखर पे अपने झंडे गाड़ना,
तू स्वयं में पूर्ण है, अथाह तेरा ज्ञान है,
भविष्य तेरा सूर्य सा, तेजस्वी है, महान है,
समस्त श्रृष्टि तेरे रोम-रोम में है रची,
तुझी में ब्रम्हा, विष्णु और महेश विद्वमान है.
...तुझी में ब्रम्हा, विष्णु और महेश विद्वमान है !
Monday, 13 July 2015
ये मेरा कश्मीर है.
चीखती रातें, रक्त-रंजित कटारे,
जलते आशियाने, सिसकती दीवारें,
याद है आज भी, वो जख्म ताज़ा है,
चुभते है तेरी कश्मीरियत के नारे.
मेरी ज़मीन से, मुझे बेदखल कर,
खुश तू हुआ था, जला के मेरा घर,
जो आज में लौटना चाह रहा हूँ,
तेरे प्यार में क्यों, दिखता मुझे डर?
तू जो आज मुझको, भाई कह रहा है,
मेरी ही चिता पे घर बना रह रहा है,
ज़रा खोल देख तेरे घर की वो टोटी,
आज भी उसमें मेरा, लहू बह रहा है.
तेरे खेल से, तेरी हर चाल से,
वाकिफ हू कातिल, तेरे हर जाल से,
बहुत रह चुका माँ के आचल से वंचित,
है लौटना अब तो हर हाल में,
जितने जतन तुझे, करने है करले,
स्वांग तुझे जितने आतें है रच ले,
गूंजेगी फिर वादी में वो घंटियाँ,
बारूद मेरे मंदिर में जितना हो भर ले.
न जिन्ना की है ये विरासत,
न गिलानी की ये जागीर है,
श्यामा प्रसाद की है ये समाधि,
ऋषि कश्यप का ये कश्मीर है,
मेरा कश्मीर है.
Sunday, 12 July 2015
The wail of Jesus
Hurt and confused,
You are my creation,
I wish I could refuse,
I watch you wrap me up,
And sell me like a soap,
Is this why I created you?
You make me lose the hope,
I watch your sheer idiocy,
This delusion you call faith,
I keep curbing my anger,
You keep tempting the fate,
Why do you think I need?
Your menial propagation,
I am universal,
Don't need your adulation,
I keep sending the warnings,
But you don't get it still,
Call me by any name you like,
I exist and forever will.
Sunday, 5 July 2015
A tale of 2 journalists
burnt alive,
he killed me,
on camera he cried,
his soul departed,
hope intact,
to get me justice,
my brethren will rise,
he hovered over the lutyens,
like a cloud ready to burst,
his tears poured out,
his death was never heard.
the second expired,
heart attack maybe,
or was he poisoned,
the truth seemed hazy,
lutyens exploded,
obituaries read,
primetime screamed,
justice was pledged,
the brethren promised,
the 2nd who deceased,
while the 1st watched,
his character being peeled.
And this is the tale of,
2 journalists who died,
why was one ignored,
while for other the pen cried?
was it because the former,
had died in a secular state?
while the latter was in communal,
though he may have died of fate?
this dear friends is how,
the lutyens plays the game,
the tale of 2 journalists,
will always be the same.
Saturday, 3 January 2015
तेरा खून न हिन्दुस्तानी है
(जिस तरह से आज ये खबर आने के बाद की भारतीय तट रक्षकों नै एक संदिग्ध पाकिस्तानी नौका को रोकने की कोशिश की और उस नौका के सवारों नै अपनी ही नौका में आग लगा ली, हर भारतीय का सर गर्व से ऊंचा हो गया. वही कही न कही २६/११ के जख्म भी हरे हो गए. परन्तु ऐसे वक़्त में भी कुछ कलम चलाने वाले बिना सत्य सामने आने की प्रतीक्षा किये, अपने ही सैन्य दलों के ऊपर प्रश्नचिन्ह लगाने लगे. यह देख के दिल में विचार आया की ऐसे वक़्त में देश की सेवा में लगे एक सैनिक के मन में क्या विचार आते होंगे. बस इसी की एक बानगी पेश है. उम्मीद है की ये कलम के सौदागर अगर मेरी कविता पड़ेंगे तो शायद उनके मृत ज़मीर में कुछ हलचल होगी.)
Wednesday, 17 December 2014
Bullets that you sowed
Friday, 7 November 2014
हिन्दू नज़र आना ज़रूरी है!
समय के संग बहता हू मैं,
सदा ही चुप रहता हू मैं,
प्रेम के बदले प्यार के,
सन्देश सदा देता हू मैं,
मगर अब हिम्मत जताना जरूरी हैं,
हिन्दू हो तो हिन्दू नज़र आना ज़रूरी है!
तेरे धर्म का मैं मान करू,
मेरे धर्म का तू सम्मान करे,
पर अब मैं चुप न रहने का,
जो काटेगा तू मेरे गले,
मैं बिस्मिल बन लड़ जाऊंगा,
जो तू मेरा अशफाक बने,
पर अब मैं चुप न रहने का,
जो तू चालें औरंगजेब चलें.
बटा हुआ हू जात से,
अपनों के भीतर-घात से,
अपने ही देश में मुर्दा हू,
है निकलना इस हालात से,
अब धर्म को अपने अपनाना ज़रूरी है,
हिन्दू हो तो हिन्दू नज़र आना ज़रूरी है!
मेरे धर्म की जो खामियां,
मिल-बांट के हम मिटायेंगे,
पर शब्द तेरे, तेरे ताने,
हम चुप कर सह नहीं पाएंगे,
होली में रंग हम खेलेंगे,
दीपावली भी मनाएंगे,
तू लाख कहे, और लाख लिखे,
हम शान से जीते जायेंगे.
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STOP ATTACKING OUR FESTIVALS |
इंसानियत के गद्दारों से,
अब पीछा हमें छुडाना है,
नैतिकता के पहरेदारों से,
देवी को फिर सम्मान दिलाना ज़रूरी है,
हिन्दू हो तो हिन्दू नज़र आना ज़रूरी है!
बंधन में न बांधो हमें,
जंजीरे तोड़ते जायेंगे.
हम पूजन कर माँ सरस्वती का,
प्रेम दिवस भी मनाएंगे,
मा भारती को हम पूजेंगे,
मंदिर में शीश नवाएँगे,
चाहे चलना पड़े हमे लाखो मील,
अब बनना जिम्मेदार है,
माँ धरती करे पुकार है,
जो तड़प रही माँ गंगा है,
उसका करना उद्धार है,
यमुना का क़र्ज़ चुकाना ज़रूरी है,
हिन्दू हो तो हिन्दू नज़र आना ज़रूरी है.
Wednesday, 5 November 2014
फिर बहेगा रायता
बच्चा लोग बजाओ ताली, फिर सर्कस आया है,
मफलर वाले बाबा ने फिर से बिगुल बजाया है,
फिर चलेंगे चप्पल-चांटे, फिर उड़ेगी स्याही,
टोपी सेना फिर निकलेगी करने चंदा उगाही,
फिर से होंगे धरने जमकर, फिर दिल्ली रेंगेगी,
लोट-पोट करने वाला नाटक दुनिया देखेंगी,
फिर से खुलेंगा झूठे सिद्धांतों का पिटारा,
फिर सड़कों पे दौड़ेगी वो नीली खटारा,
फिर से होंगे दावे ढेरो, मुफ्त बिजली और पानी,
फिर से पड़ेगी बच्चो की झूठी कसमें खानी,
फिर टीवी पे होंगे साक्षात्कार क्रांतिकारी,
फिर ट्विटर पे चीखेंगे उनके बीस हजारी,
होटल अमन के गलियारों में फिर से होंगी बाते,
'झाड़ू' थामे निकलेंगी फिर से 'हाथ' की रातें,
पद का लोभी गली मोहल्ले जा जा के खासेंगा,
क्या एक बार फिर दिल्ली की जनता को वो फासेगा?
फिर बहेंगा रायता, फिर होगा दिमाग का दही,
उनन्चास दिनों का धोखा खा क्या दिल्ली चुनेगी सही?
Thursday, 7 August 2014
प्राण(a tribute to a great man)
चित्रों में कथा सुनाता था,
शब्दों में जादू रचता था,
कुछ ऐसे दिए किरदार उसने,
हर बचपन में वो बसता था,
कभी बिल्लू की बदमाशी में,
कभी पिंकी की शैतानी में,
कभी साबू के गुस्से में,
एक हँसी वो रचता था,
हीरे के जैसी थी उसकी,
हर रचना चमचमाती सी,
कंप्यूटर से तेज़ दिमाग के जो,
किस्से बन के बरसता था,
हाँ चला गया इस दुनिया से,
देकर खुशिया कितनी सारी,
वो चित्रकार, वो कथाकार,
जिस पढ़ भारतवर्ष हँसता था।





















