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Monday, 13 July 2015

ये मेरा कश्मीर है.




चीखती रातें, रक्त-रंजित कटारे,
जलते आशियाने, सिसकती दीवारें,
याद है आज भी, वो जख्म ताज़ा है,
चुभते है तेरी कश्मीरियत के नारे.
मेरी ज़मीन से, मुझे बेदखल कर,
खुश तू हुआ था, जला के मेरा घर,
जो आज में लौटना चाह रहा हूँ,
तेरे प्यार में क्यों, दिखता मुझे डर?
तू जो आज मुझको, भाई कह रहा है,
मेरी ही चिता पे घर बना रह रहा है,
ज़रा खोल देख तेरे घर की वो टोटी,
आज भी उसमें मेरा, लहू बह रहा है.

तेरे खेल से, तेरी हर चाल से,
वाकिफ हू कातिल, तेरे हर जाल से,
बहुत रह चुका माँ के आचल से वंचित,
है लौटना अब तो हर हाल में,
जितने जतन तुझे, करने है करले,
स्वांग तुझे जितने आतें है रच ले,
गूंजेगी फिर वादी में वो घंटियाँ,
बारूद मेरे मंदिर में जितना हो भर ले.

न जिन्ना की है ये विरासत,
न गिलानी की ये जागीर है,
श्यामा प्रसाद की है ये समाधि,
ऋषि कश्यप का ये कश्मीर है,
मेरा कश्मीर है.

Thursday, 15 August 2013

आज़ादी है, आज़ाद नहीं!


आज़ादी है, आज़ाद नहीं!
आबादी है, आबाद नहीं!

पिंजरे से भले हो निकल चुके,
पर कटे हुए, अब तड़प रहे,
वो ओड़ सफेदी खादी की,
हमें लूट रहे, सब हड़प रहे,
सड़को पे अब भी सोते है,
और भूख से बच्चे रोते हैं,
वो बात करें आकाशों की,
हम दस्त से बचपन खोते है,
गलियों में आबरू लुटती है,
और बेटियां कोख में मरती है,
क्या इंसान अब तो देवी भी,
यहाँ आने से भी डरती है,
वो जात-धर्म का खेल रचे,
हम काट रहे है अपनों को,
देखे जो अमर शहीदों ने,
वो लूट रहे उन सपनो को,
है देश हुआ अब खंडित है,
बिहार-मराठा लड़ते है,
वो गीत एकता के जो थे,
बस पन्नो में अब सड़ते है,
अब तो नेता ही गुंडा है,
और गुंडे बन गए नेता है,
खद्दर तानाशाह जुल्म करे,
और खाकी रिश्वत लेता है,
हर बरस ये दिन जब आता है,
सीना ठोके हम गाते है,
उड़ने की बातें करते है,
दलदल में धसते जाते है,
बस क्रिकेट के हरे मैदानों में,
देशप्रेम अब ज़िंदा है,
आज़ादी का जश्न तो फ़िल्मी है,
सच है के हम शर्मिंदा है.

हे चाटुकार!





हां तुम चाटुकार हो, मन से तुम बीमार हो,
है लीलता जो देश को, हा तुम वही बुखार हो,
है रूह तेरी क्यों मरी? क्यों बन चुके ग़ुलाम तुम?
क्यों किसी के तलवों के नीचे निसार हो?

क्यों भला किसी की चाटुकारिता में व्यस्त है?
सो रहा है तू, उधर देश तेरा पस्त है,
क्यों किसी के वास्ते, झूठ तुम यूँ गड़ रहे?
क्यों किसी की शान में, तुम कसीदे पड़ रहे?
क्या तुझे दिखे नहीं सत्य सामने खड़ा?
क्या तेरा ज़मीर है पाताल में गड़ा?
सड़ रहे हो क्यों भला?जाग लो, जंग करो,
मरना है अगर तो मातृभूमि के लिए मरो.

हाँ तुम चाटुकार हो, विकृत हो, विकार हो,
है लीलता जो देश को, हाँ तुम वही बुखार हो,
नहीं तेरे हृदय में अब कोई भी संवेदना,
हा दे रहे हो हर घड़ी, माँ को भारी वेदना.

सरहदों पे रोज़ वीर है शहीद हो रहे,
तुम इधर बेशर्म, खादियों को ढो रहे,
खेलते हो जा रहे, राजनीती बेहया,
डाल के पड़े हो इंसानियत पे बेड़िया,
चीखते हो लड़ रहे, ख्वामखाह झगड़ रहे,
जिनको पैरों में गिरे, वही तुमहे रगड़ रहे,
आदमी हो या के तुम जानवर हो बोल दो,
सत्य सामनें खड़ा, आँखें अपनी खोल दो.

हां तुम चाटुकार हो, व्यर्थ हो, बेकार हो,
जला रहा जो देश को, ज़हर की वो फुहार हो,
है देश सर्वोपरि, उठो, चलो, कर्म करो,
हाँ त्याग दो ये नीचता, ज़रा सा तो शर्म करो.





Sunday, 10 March 2013

Begging for a life


My eyes pour out and words all fail,
When I see the plight of this Indian lot,
Whose day starts when the world is dreaming,
And ends long after the sun goes out,
Weak and dirty they walk the street,
Begging  for a coin of life all day,
Searching for lunch in the trash,
In blind hope of making some hay,
Pleading outside the palace of gods,
Hungry, abused, get chased away,
The god is bathing in the milk,
Insulting their hunger, every day,
Days, months and years roll by,
The world may change but life is hell,
Outside those lavish shopping malls,
Standing wearing a putrid smell,
Comes the minister, ribbon’s cut,
They sleep under those bridges high,
Ignored by the growth we see,
They stand right in front of our eyes,
And heartless, cowards we have become,
Flip a coin and pat our self,
At every corner life is crying,
But we only feel sympathy for them.